भजन।सच्चे हृदय का प्राणी, मंदिर जो जाएगा।बज उठेगी घंटियाँ, मिल भगवान जायेगा_sri


भजन
@श्रीराम रॉय 9471723852

सच्चे हृदय का प्राणी, मंदिर जो जाएगा
बज उठेगी घंटियाँ, मिल भगवान  जायेगा।

सारे ग्रन्थों में लिखा सारे धर्म कहते हैं
शुद्ध अन्तःकरण में भगवान रहते हैं।
जो छलकपट को त्याग जायेगा
खुल जायेगा द्वार , मिल भगवान  जायेगा।।

भटक भटक मंदिर केवल पछतायेगा
जिसका मन ही मैला वह क्या पायेगा
दुखियों को लगा गले आँसू बहायेगा
चित्त होगा निर्मल, मिल भगवान  जायेगा।।

दूसरों का धन अपना जो समझेगा
जीवन मे सदा दुःख, दुःख ही पायेगा
दया भाव जिसमें, न क्रोध आयेगा
सब होगा एक समान , मिल भगवान जायेगा।।

महर्षि दधीचि। सुषमा सिंह।औरंगाबाद_jay gurudew


महर्षि दधीचि
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   ऋषियों  तपस्वियों  की  इस  स्थली 
   भारत भूमि  में समय-समय  पर  ऐसे
   असाधारण  ऋषियों  का  प्रार्दुभाव हुआ
   हैं, कि विश्वास करना नामुमकिन लगता
   है ।आज  उन्हीं  में से एक महान तपस्वी                          दधीचि के भक्तिमय  एवं  कल्याणकारी   चरित्र  से  रूबरू  होते हैं।
 
 एक  समय ऋषि  दधीचि  गौतमी  नदी
  के  तट पर  साधना  में  लीन थे। उसी
  समय  नारदजी  वहां  पहुंच  गये  और
  उनसे  तत्व ज्ञान और  भक्ति  के  बिषय
  में  पूछ बैठे । उत्तर  में  उन्होंने  कहा-
  मेरी  साधना, मेरे  साध्य  सब  शिव ( कल्याण) हैं। जब  मैं  समाधि  में  होता
  हूं ,तो  हर  तरफ  मुझे वही  ( कल्याण) 
  दीखाई  देते  हैं।और  जब मैं  जागृत 
  होता हूं , तो  उस  समय भी  मुझे उनका                   ही  दर्शन  होता  है  हे देवर्षि  मेरा सारा
 तप  एवं  सभी  विद्याएं  लोक सेवा  के
लिए  है ।  फिर  उन्होने कहा  ' मैं  चाहता
 हूं मेरी  चेतना  के  साथ  साथ मेरे  शरीर
 का एक एक अंग लोक सेवा के निहितार्थ
 हो ।

               तत्पश्चात  कुछेक बर्ष  ही  बीते
  होंगे  कि उनकी  वाणी  सत्य  हो  गई।
  वृतासुर  के  आतंक से  समूचा भारत   
  बर्ष त्रस्त  था, देवताओं  की  भी उसपर
  एक  ना चलती  थी। उसकी  यातनाओं
   से  पिडित इन्द्र ने उनसे उनकी अस्थियों
  की  मांग  की। जिसे  उन्होंने सहर्ष 
  स्वीकार लिया।  (वैसे तो इन्द्र  ऋग्वेद के
  सबसे  बड़े  देवता  माने  जाते, लेकिन 
  मेरे विचार  से उनसे  बड़ा  छलिया कोई
  दूसरा  नहीं  था।  हमेशा  आज के   राजनीतिज्ञों की भांति अपनी सता की
  चिन्ता  में  लगे रहते थे , खुद को बचाने
  के  लिए किसी  की  जान  लेने  में  भी
  तनिक  नहीं हिचकिचाते  थे)  और  यही
  उन्होंने  महर्षि  दधीचि  के साथ  भी
  किया। बेहिचक  महर्षि  का  देह मांगना
  उन्हें  कहीं  से  अनुचित नहीं  लगा ।
  महर्षि  ने  खुशी  से  बिना  विलम्ब
  किये  योगबल  से  अपना  देह  त्याग 
  दिया, तब  उनकी  अस्थियों  से बज्र
  बना और  उस असुर  का संहार  हुआ ।
                 इस  प्रकार  महर्षि  दधीचि
   त्यागपूर्ण  आचरण  से इतिहास  में
   अमर , अद्वितीय और अनुपम हो गये ।
  वैसे तो  हमारे  शास्त्रों  में  अनेकानेक
  त्याग भरे  उदाहरण भरे पड़े  हैं, जिसका
  आज  के  युग  में आचरण  तो संभव 
  नहीं  है लेकिन  इसका श्रवण  भी  कोई
  उचित  नहीं  समझता,  यही  कारण
  है कि  हर  पीढ़ी  पहले की  पीढ़ी  से
  दो  कदम  ज्यादा स्वार्थी  और  आत्म 
  केन्द्रित  होती  जा रही है,अंत:  ऐसी
  कथाओं  को  पाठ्यक्रम में शामिल किया
  जाना  चाहिए ।
                              सुषमा सिंह
                            ---------------------
( सर्वाधिकार सुरक्षित)

ॐशिव ॐशिव ॐकारा शिवॐकारा शिव तव शरणम।गोपाल मिश्र_om

ॐशिव ॐशिव ॐकारा शिव
ॐकारा शिव तव शरणम. 

ब्रह्मा विष्णु रुद्ररूप शिव 
त्रिगुणाकार शिव तव शरणम 
ॐशिव... 

 निराकार शिव दिव्य रूप शिव
 सच्चिदानंद शिव तव  शरणम
ॐशिव..... 

 चंद्रभाल शिव  मुंडमाल शिव 
 डमरुधर शिव तव शरणम. 
ॐशिव..... 

 नीलकंठ शिव गौरवर्ण शिव
 पिनाकधर शिव तव शरणम. 
ॐशिव....... 

 श्वेतांबर शिव पीतांबर शिव
 बाघांबर शिव तव शरणम. 
ॐशिव...... 

 एकानन  शिव चतुरानन शिव
पंचानन शिव तव शरणम. 
...... 

 महाकाल शिव सूक्ष्म रुप शिव
आनंदकंद शिव तव शरणम. 
ॐशिव......

मृत्युंजय शिव रिपुभंजन शिव 
अभयंकर्ता शिव तव शरणम. 
ॐशिव.....
---गोपाल मिश्र, सिवान

डांकू रत्नाकर की कहानी ,सुषमा सिंह की लेखनी_parampuridham

डांकू रत्नाकर की कहानी
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वाल्मीकि  रामायण  आदिग्रंथ   के  नाम  से  ख्यात  है।  आदिग्रन्थ  यानि  विश्व  साहित्य  का  पहला  ग्रंथ । इस  ग्रंथ  के 
रचयिता  कवि  वाल्मीकि  आदि कवि कहलाए ।

कवि  वाल्मीकि  के  बारे  में  मशहूर  है, कि  वाल्मीकि  बनने  से  पूर्व  वे  एक  दुर्दांत   दस्यु  थे  जो  राहगीरों  से  लूटपाट
किया  करते थे। किंवदंती  है  कि  वाल्मीकि वाल्यकाल  में  गुम  हो  गये  थे
और  किसी  निसंतान  भील  को  प्राप्त
हुए और  उसी  निसंतान  भील  ने  इन्हें
पाल-पोस  कर  बड़ा  किया  और  नाम      दिया   रत्नाकर ।  उस  भील  के जीवकोपार्जन का साधन  लूटपाट  ही  था
अतः स्वाभाविक है इन्होंने  भी  जीवन यापन के  लिए यही  मार्ग अपनाया।  

 जीवन  में  घटित  अनेक  घटनाओं  में 
कुछ  घटनाएं  ऐसी  होती  हैं,जो  मनुष्यों
को  पूरी  तरह  बदल  कर  रख  देती  हैं।
एक  बार  नारद मुनि  कहीं  जा  रहें  थे
रास्ते  में  डाकू  रत्नाकर  से  सामना  हुआ
रत्नाकर  ने  कहा  रुको,और  जो  कुछ 
भी  है   मुझे  दे  दो । नारदजी  ने  कहा 
हमारे  पास  तो  मात्र  एक  कमंडल  है।
रत्नाकर  ने  कहा  यही  दे  दो।  तब नारदजी  ने  कहा दे दूंगा  लेकिन  एक बात बताओ  कि  तुम  यह  बुरा  काम  क्यो   करते   हो?   तब  रत्नाकर  ने कहा
  ' परिवार  के  लिए '  फिर नारदजी
  ने  कहा  जब तुम परिवार  के लिए  इतना  बुरा काम  करते  हो  तो ,इस
 पाप कर्म का  आधा  बोझ भी  क्या तुम्हारे परिवार  वाले लेंगे ?  क्योंकि  लूट पाट  तो  तुम करते  हो ,तो  पाप  तो  तुम्हारे  सिर  आएगा।  बात समझ  रत्नाकर  कुछ  देर  ठिठका  और
 फिर  बोला‌  मैं  परिवार वालों से
पूछकर  आता  हूं,  तब  तक  तुम  यहीं
ठहरो।  नारदजी  ने कहा  'ठीक  है'! 
तब  रत्नाकर  अपने  घर  गया  और परिवार वालों  से  पूछा  तो  उन्होंने ना
में  उतर  दिया ।यह सुनकर  रत्नाकर
सकते  में  आ  गया  और  बहुत  दुखी 
हुआ, फिर  भागता  हुआ  नारदजी  के
 पास  आकर  सारी  बातें  कह  सुनाया।
तब  नारदजी  ने  उससे  इस निकृष्ट  कर्म को त्यागकर  राम शरण  में  आने  की बात  कही  और‌  राम नाम  का  मूलमंत्र दिया ।  कहा  जाता  है  कि रत्नाकर ने
इतने  पापकर्म  किये  थे  कि उससे  राम नाम  उच्चरित न होकर मरा मरा  कहलाने
लगा  और  मरा मरा  का उल्टा राम हुआ और राम नाम के असर से  इनका  जीवन 
परिवर्तित  हो गया। हृदय परिवर्तन  के बाद  वो  घोर तपस्या के लिए  चले  गए
और  परिष्कृत हो अपने नये रुप वाल्मीकि के रुप में  मशहूर  हुए।  कहा  जाता  है कि वाल्मीकि  त्रिकालदर्शी  थे। रामायण की  अनेक घटनाओं  को घटित होने के पूर्व से ही  अपनी  दिव्य दृष्टि  से जान गए
थे  सीताजी भी अयोध्या  छोड़ने के पश्चात्
इन्हीं  के  आश्रम में  वनदेवी  बनकर 
रहती  थीं और  यहीं  पर लवकुश  का जन्म  हुआ  था।
      वाल्मीकि  के  जीवन चरित  से  स्पष्ट 
होता  है  कि  एक  बुरा व्यक्ति  भी  शुद्ध 
आचरण  से  अन्योतम  पद पाकर जगत में वंदनीय  बन  सकता है।

                      सुषमा सिंह
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 (सर्वाधिकार सुरक्षित)

प्रभु यह कैसी लीला है कुछ शिकायत कुछ गिला है जो नहीं मांगा वह भी दिया जो मांगा क्यों नहीं मिला है.gopal mishra

प्रभु यह कैसी लीला है
 कुछ शिकायत कुछ गिला है
 जो नहीं मांगा वह भी दिया
 जो मांगा क्यों नहीं मिला है.

 कोई रोता है कोई हंसता है
 कोई हारता कोई जीता है
 निर्द्वन्द्व  भाव  से ढूंढा जिसने, 
 उसको ही तू तो मिला है.

 तुम चांद की छलकती शीतलता, 
 सूरज की बरसती गर्मी है
 साँझ सुबह की स्वर्णिम आभा, 
 आकाश में फैला रंग नीला है.

 यह संसार तुम्हारी काया है
 प्राणवायु ही तुम्हारी सांसे हैं
 वजह प्रभु आप बतलाएं, 
 हवा क्यों बना जहरीला है.

 आप दयासिंधु करुणानिधान है
 सभी संकटों के समाधान हैं
 सुख-दुख आपकी माया है, 
 आगे पीछे चलता सिलसिला है.

 अब तो करुणा बरसा दें 
 अपनी महिमा तो दिखला दें 
 सांसो का रुकना थम जाए, 
 लगे संसार अब हर्षिला है.
--गोपाल मिश्र, सिवान,बिहार

प्रेम शंकर प्रेमी के भजन ,पवनपुत्र मैं विनती करता तुझसे बारम्बारआई विपत्ति इसे मिटा दे कर इसका संहार

हनुमान भजन
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पवनपुत्र मैं विनती करता  
तुझसे बारम्बार
आई विपत्ति इसे मिटा दे 
कर इसका संहार

लगी थी शक्ति लखनलला को
 तुमने प्राण बचाया था
लाए संजीवन हिमगिरी से
 उनको तुरत जिलाया था
देख दशा इस धरती का 
जो मचा है अब चित्कार
आई विपत्ति ------------
कर इसका------------

दिख रहा था कार्य असम्भव
संभव कर दिखलाया था
सीता माँ का खोज किया और
लंका नगर जलाया था
आज जरूरत हमें है तेरी
 सुन ले भक्त पुकार
आई--------------
कर-------------

राम भक्त बजरंगबली तुम
संकट हरनेवाले हो
जहाँ होता अमंगल सबका
मंगल करनेवाले हो
हे हनुमान करो कल्याण
 तू सबका करो उद्धार
आई विपत्ति-------------
कर--------------

पवनपुत्र मैं-----------
तुझसे-----------
आई विपत्ति-------------
कर----------------
गीतकार---प्रेमशंकर प्रेमी (रियासत पवई )औरंगाबाद

ओम नम: शिवाये , ओम न: शिवाये हर हर गंगे महादेव शंभु ओम नम: शिवाये-अलका-पांडेय


ओम नम: शिवायें 
—अलका 

ओम नम: शिवाये , ओम न: शिवाये 
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

सिर तेरे जटा विराजे और गंग की धारा , गंग की  धारा 
चंद्र कलाएँ साथ सोहे 
नीलकंठ मतवाला ...
ओम नम: शिवाय ....
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

गले में शोभित सर्पों की माला 
तन लपेटे मृगछाला , 
भंग का रंग जमाये 
आशुतोष अावढर दानी 
ओम नम: शिवाय....  
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

एक हाथ शोभित डमरु 
, दूजे त्रिशूल विराजे 
तन में भस्म लिपटायें 
बाबा भोलेनाथ 
ओम नम: शिवायें ....
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

खाने को माँगे धतूर के फलवा
और भंग का गोला , 
चढ़ने को माँगे बैला सवारी 
शंकर भोले भंडारी 
ओम नम: शिवायें ....
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

बाय अंग मे गौरा विराजे 
गोदी में गणपति लाला 
ओम नाम का प्याला 
पिते सारे भक्त 
ओम नम: शिवाये ...
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

सब से प्यारे , सबसे निराले 
बाबा भोले भंडारी 
जब डोले जीवन नैया 
बाबा ही नाव खिवैया 
संकट काटे कस्ट मिटाये 
जीवन में ख़ुशियाँ लाये 
ओम नम:शिवाये ...
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....
अलका पाण्डेय -अग्निशिखा मंच,मुम्बई

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