ओम नम: शिवाये , ओम न: शिवाये हर हर गंगे महादेव शंभु ओम नम: शिवाये-अलका-पांडेय


ओम नम: शिवायें 
—अलका 

ओम नम: शिवाये , ओम न: शिवाये 
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

सिर तेरे जटा विराजे और गंग की धारा , गंग की  धारा 
चंद्र कलाएँ साथ सोहे 
नीलकंठ मतवाला ...
ओम नम: शिवाय ....
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

गले में शोभित सर्पों की माला 
तन लपेटे मृगछाला , 
भंग का रंग जमाये 
आशुतोष अावढर दानी 
ओम नम: शिवाय....  
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

एक हाथ शोभित डमरु 
, दूजे त्रिशूल विराजे 
तन में भस्म लिपटायें 
बाबा भोलेनाथ 
ओम नम: शिवायें ....
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

खाने को माँगे धतूर के फलवा
और भंग का गोला , 
चढ़ने को माँगे बैला सवारी 
शंकर भोले भंडारी 
ओम नम: शिवायें ....
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

बाय अंग मे गौरा विराजे 
गोदी में गणपति लाला 
ओम नाम का प्याला 
पिते सारे भक्त 
ओम नम: शिवाये ...
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....

सब से प्यारे , सबसे निराले 
बाबा भोले भंडारी 
जब डोले जीवन नैया 
बाबा ही नाव खिवैया 
संकट काटे कस्ट मिटाये 
जीवन में ख़ुशियाँ लाये 
ओम नम:शिवाये ...
हर हर गंगे महादेव शंभु 
ओम नम: शिवाये ....
अलका पाण्डेय -अग्निशिखा मंच,मुम्बई

जय जय पवन पुत्र हनुमान तेरी सदा ही जय जय कार हे अंजनी पुत्र हे केसरी नंदन विध्न हरो जगत का कल्याण करो_dr alka pandey


भक्ति गीत 
@डॉ अलका पांडेय

हनुमान जी 

जय जय पवन पुत्र हनुमान 
तेरी सदा ही जय जय कार 
हे अंजनी पुत्र हे केसरी नंदन 
विध्न हरो जगत का कल्याण करो ।।

करते तेरी पूजा ,अर्चन ,वंदन 
हे वीर  पराक्रमी महाबली बंजरगी ।।
राम के दूत कहलाते हो ह्दय में राम की मूरत ।
राम के साथी हो राम ही पालन हार ।।

राम नाम को बनाया जीवन आधार । 
राम नाम ही तेरा है घर। संसार ।।
उँगली में उठाय गिरिराज ले आये संजीवनी ।।
दिया जीवन दान लखन को माँ कौशल्या हर्षाये ।
जनक पुत्री को खोज निकाल लंका में आग लगाई
बंधन से मुक्त कराया असुरों का संहार किया ।।

श्री राम ने ह्दय से लगाया  । 
तेरा प्रताप सारे विश्व ने माना 
तेरा नाम लेने से मिटते सकल क्लेश ।
तुम हो सदा अविनाशी पवनपुत्र हनुमान ।।

सुन लो अलका की पुकार 
कर रही हाथ जोड़ कर गुहार 
कोरोना से सब को बचाओ महामारी को दूर हटाओ । 
संताप हरो , भय दूर करो हनुमान ।।

मौत का भय घरों में पसरा 
लाशो का ढेर श्मशान में लगा 
सबको को दो कोरोना मुक्त वरदान । 
जीवन भय मुक्त करो हनुमान केसरी नंदन जगत निकंदन 

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई

पढिये अग्निशिखा मंच की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अलका पांडेय का आलेख, विपरीत परिस्थितियों में मन को कैसे काबू में रखे_guruji


 विपरीत परिस्थितियों में मन को कैसे काबू में रखे

शीर्षक-धैर्य से सामना करे 

विषम परिस्थियाँ में अक्सर हम धैर्य खो देते है झुँझलाहट आती है और भी बहुत सी बातें है पर हमें मन को क़ाबू में रख संयम से काम लेना होगा । 
अक्सर देखने में आता है की ज्यादातर लोग छोटी छोटी बातो से परेशान हो जाते है। काम में झुंझलाहट, काम में मन नहीं लगना ये आजकल की भागती जिंदगी का एक हिस्सा बन चूका है। ज्यादातर लोग काम से होने वाले तनाव से बचने के लिए अन्य क्लासेज़ भी शुरू कर लेते है। लेकिन या तो वो निर्देशो का सही पालन नहीं कर पाते है या फिर काम का दबाव उन्हें निर्देश का पालन करने ही नहीं देता है। नतीजा वही काम का दबाव, झुंझलाहट और फिर गुस्सा। क्या कारण है की जिनकी वजह से हम परेशान होने लगे है। 
पहला प्रयास तो यह हताश हुए तो हताशा आपके ऊपर कितनी हावी  हुई, यह दूसरी बात की पड़ताल आपको करना है, हताश होना, कुछ पल के लिए हताश होना। कई बार होता है लेकिन फिर उम्मीद की किरण जगती है, मन में उत्साह का भाव जगता है और लोग पुनः नए उत्साह के साथ अपने कार्य में जुड़ जाते हैं तो उतनी कठिनाई नहीं होती लेकिन जब हताशा हावी हो जाती है तो अवसाद का रूप धारण कर लेती है। वही अवसाद डिप्रेशन बन जाता है और किसी-किसी के लिए डीप डीप्रेशन होता है। वो अपने जीवन से ही हार जाता है तो मन कभी हताश हुआ नंबर वन हताशा आई तो वह तुम पर कितनी हावी हुई, नंबर दो और नंबर 3 तुम्हारी हताशा के आगे तुमने हार तो नहीं मानी। हताशा के आगे हार तो नहीं गये, हताश होना और हार जाना इन दोनों में बड़ा अंतर है।हताश कभी नहीं होना आशा की किरण को हमेशा जलाये रखना चाहिये । 
बडे लोग कह गये है , सफलता एकाएक नहीं मिलती, सतत प्रयत्नों के बाद ही कोई व्यक्ति सफलीभूत हो पाता है, यह बात गांठ में बंद करके रखना चाहिए। हम कोई भी कार्य करें, किसी भी कार्य के क्षेत्र में आगे बढ़े, चाहे लोक हो या लोकोत्तर। हमें उस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए इस बात को अपने हृदय में अंकित करके रखना चाहिए कि बार-बार बार-बार के प्रयास से ही हम अंतिम परिणाम तक पहुंचते हैं। धैर्य लगन और मेहनत से सफलता मिलेगी बार बार कोशीश करे पर हताश न हो ।  जब भी विपरीत परिस्थिति सामने आती है, मनुष्य का मन टूट जाता है, घबरा जाता है, अब क्या करूं, कोई रास्ता नहीं। ऐसी विपरीत परिस्थिति में ईश्वर का ध्यान करे कोई न कोई राह अवश्य मिलेगी । 
विकट परिस्थितियों का सामना तो हर किसी को करना पड़ता है लेकिन सामान्य व्यक्ति में और एक समझदार व्यक्ति में इतना ही अंतर है कि सामान्य व्यक्ति मुश्किलों को देखकर घबराता है और विशेष व्यक्ति वह होता है जिसके अंदर समझ होती है, वह उनसे मुश्किलें घबराती है, पास आए तो भी उसका सामना करता है। मुश्किलों का सामना करने वाले समाधान पाते हैं और मुश्किलों से घबराने वालों को घुटने टेकना पड़ता है। हमारे जीवन में कोई मुश्किल आये, हमारे  जीवन में कोई परेशानी, कोई कठिनाई, कोई विपरीत परिस्थिति हो तो देखो, इस परिस्थिति से उबरने का कोई रास्ता है? नहीं है तो कोई बात नहीं। उसी परिस्थिति में जीनाहमारी  मजबूरी है तो हमारी कुशलता इस बात पर है कि उस परिस्थिति से उबरने की कला सीखो और ऐसा रास्ता चुनो जिससे उस परिस्थिति में जीते हुए भी हमारा  नुकसान कम से कम हो।
आज की बात करते है 
आज की परिस्थितियों में दुख,  ग़म आर्थिक तंगी , हम एक साल से झेल रहे है अपनों का साथ छूटा बहुत विकट परिस्थितियाँ है और आगे कब तक चलेगी यह महामारी की त्रासदी कुछ पता नहीं है पर हमें हिम्मत नहीं हारनी है । धैर्य रखना है साकारत्मक विचार लाने है और हर सम्भव कोशिश करें ख़ुश रहने की हंसने की यह दौर भी चला जायेगी और नई सुबह फिर आयेगी , रह जायेगी इस महामारी के अवशेष यादों में जो हम बताया करेंगे कैसे हमने यह विकट परिस्थितियों का सम्मान किया । यही जीवन है हर हाल में हमें जीना है । 

डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अग्निशिखा मंच

सुनकर नदी आनंद की ,* *डुबकी लगाई डूब।**लेकिन किसी का तन न भींगा,* *और गया कोई डूब_jai sacchidanand

*आनंद:-*
@श्रीराम रॉय 
🏵️
*सुनकर  नदी आनंद की ,*
 *डुबकी लगाई डूब।*
*लेकिन किसी का तन न भींगा,*
 *और गया कोई डूब।।*
🏵️
अपने हृदय की फुलवारी में ,
बैठे प्रभु आनंद।
पूछता पत्थर पहाड़ से ,
कहाँ मिले  आनंद।।
🏵️
*दूसरों को सुख देकर,*
*सुख न करता चाह।*
*बून्द एक जल से भी,* 
*पाता आनंद अथाह।।*
🏵️
आनंद सुगंध वह पुष्प है ,
जो भँवरों के  बीच।
बस एक बूंद आनंद का ,
दे मरुस्थल को सींच।।
🏵️
*बस त्याग करना होगा,*
*कामी कपटी वेश।*
*श्रीराम आनंद मिले,* 
*जब चाहो जिस देश।।*
----------श्रीरामरॉय www.palolife.com

सुख में हम वौराय रहत, दुःख में करते हाय हायसुमिरन करते हरि अगर,सुख-दुख समदर्शी हो जायदुःख भी एक कसौटी है,जिस पर मानवता परखी जाती हैसोना शुद्ध बनाने को, विकराल अग्नि तपस दी जाती है_jai sacchidanand ji

शीर्षक -   🌸 सुख-दुख 🌸

सुख में हम वौराय रहत, दुःख में करते हाय हाय

सुमिरन करते हरि अगर,सुख-दुख समदर्शी हो जाय

दुःख भी एक कसौटी है,जिस पर मानवता परखी जाती है

सोना शुद्ध बनाने को, विकराल अग्नि तपस दी जाती है

मरी हुई खालों की सांसों में, ताक़त इतनी होती है

वह लोहा कठोर को , पानी पानी कर देती है

हम जिंदा सांसों के शरीर बुलंद हैं

तूफानों की कर सकते गति कुंद हैं

दुःख से मत घबराओ साथी

दुःख जाता है,तो सुख आता है साथी

सुख- दुःख, दुःख- सुख जीवन चक्र है साथी

झंझावात-संकट आयें कितने ही,
हस्ती हमारी मिटा सकते नहीं वे साथी

रोते रोते हंसना-हंसते हंसते रोना,कला है भारी

जो इस कला को सीखा,हो जाती उसकी गति न्यारी

यह भी प्रकृति सुरक्षा का , सृष्टि संतुलन है

वह शुद्धता का अनुलोमन करती, त्याज्य का करती विलोमन है

मित्रो जग है, निशा - उषा का आंगन
विरह - मिलन का विचलन - आलिंगन

साहस, संयम, धैर्य न छोड़ो हो कितना भी सर पर भार

कर्म, कर्तव्य,अरु श्री हरि मत छोड़िए,हो जायेगा बेड़ा पार

   🙏 जय श्री हरि 🙏
चंद्रप्रकाश गुप्त "चंद्र"
             (ओज कवि)
         अहमदाबाद, गुजरात

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             सर्वाधिकार सुरक्षित
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महागौरी शिवा शक्ति धवलवर्णेशुशोभिता, लक्ष्मीरूपे हृदये मम वशो देवी शिववंदिता_gopal mishra

जगताधारा ब्रह्स्वरूपा, अजानन्ता अज्ञेया. 
मातृरूपे हृदये मम वशो देवी शिववन्दिता.
 
शिवा काली क्षमा धात्री कल्याणी विस्तृता, 
क्षमारुपे हृदये मम वशो देवी शिववंदिता. 

शैलकन्या गौरवर्णा ब्रह्माण्डे चैतन्य विसृजिता, 
शान्तिरूपे हृदये मम वशो देवी शिववंदिता. 

ब्रह्मचर्या ज्ञानातीता हस्तकमण्डलशोभिता, 
ज्ञानरूपे हृदये मम वशो देवी शिववंदिता. 

चंद्रघंटा अट्टहासा प्रणवध्वन्यानुनादिता, 
भक्तिरूपे हृदये मम वशो देवी शिववंदिता.

 कुष्मांडाआदिशक्ति सूर्यज्योति  समप्रभा, 
 कांति रूपे हृदये मम वशो देवी शिववंदिता. 

स्कंदमाता मोक्षदाताः भक्तानां दुखहारिणी, 
इच्छारूपेण हृदये मम वशो देवी शिववंदिता. 

कात्यायनी ऋषिकन्या योगमाया भक्तिदा, 
शक्तिरुपे हृदये मम वशो देवी शिववंदिता. 

कालरात्रि भद्रकाली भक्तानां अभयंकरा, 
आनंदरूपे हृदये मम वशो देवी शिववंदिता. 

महागौरी शिवा शक्ति धवलवर्णेशुशोभिता, 
लक्ष्मीरूपे हृदये मम वशो देवी शिववंदिता. 

सिद्धिदात्री विजया कामा सर्वसिद्धिप्रदायिनी, 
निष्ठारूपे हृदये मम वशो देवी शिववंदिता. 

इदं स्तोत्रं पुण्यदायी भक्तिदायी निश्चितम, 
यत्यत चिन्तये कामं तत सर्वं सफलं भवेत.
----गोपाल मिश्र, सिवान 

हकीकत बयां करती सुखविंदर सिंह की दो रचनायें_original

1औलाद परिन्दों जैसी है 
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औलाद हो गई परिन्दों के जैसी है,
बड़े  हो कर  उड़ जाती ही वैसी है।

स्वप्न पूर्ण बच्चों के ही करते करते,
माँ बाप की होती ऐसी की तैसी है।

अंगुली पकड़ के  चलना सिखाया,
छोड़ जाती संताने हो गई  कैसी है।

जवानी में कमा कर सदा खिलाया,
बुढ़ापे में होती नहीं कभी हितैषी हैं।

मन्दिर ,गुरूद्वारों में रहे सेवा करते,
माता  पिता के लिए दरिंदों जैसे है।

मनसीरत पीढ़ी को कैसे सिखलाए,
संस्कार मिटते कच्ची मिट्टी जैसे है।
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 2माँ बाप हैं लाचार 
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माँ  बाप  हो  गए  हैं लाचार,
संस्कार   बिक रहे हैं बाजार।

सीने बन  जाते  हैं  फौलाद,
औलादें नहीं करे दरकिनार।

मतभेद  सामने  आ   रहे हैं,
मनभेद  खड़ी करते  दीवार।

निलय  सुने  से बन्द पड़े है,
ईमारतें  खड़ी ऊपर मीनार।

प्प्यार  बाजारू   बेच  रहे हैं,
अपने बन गए हैं ज्यों सुनार।

रिस्तों की कीमत आंकते हैं,
नफरत की बहने लगी बहार।

माता पिता हैं  व्यथा सुनाएँ,
टूट  रहे हैं  किए हुए  करार।

मनसीरत  दिल से रो रहा है,
संताने   सताने  को   तैयार।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत 
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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